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कृषि सक्सेस स्टोरी

निरंजन सरकुंडे का महज डेढ़ बीघे में बैंगन की खेती से बदला नसीब

निरंजन सरकुंडे का महज डेढ़ बीघे में बैंगन की खेती से बदला नसीब

किसान निरंजन सरकुंडे ने बताया है, कि उनके पास 5 एकड़ खेती करने लायक भूमि है। पहले सरकुंडे अपने खेत में पारंपरिक फसलों की खेती किया करते थे। जिससे उनको उतनी आमदनी नहीं हो पाती थी। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, बिहार और हरियाणा में ही किसान केवल बागवानी की ओर रुख नहीं कर रहे। इनके साथ-साथ दूसरे राज्यों में भी किसान पारंपरिक फसलों की जगह फल और सब्जियों की खेती में अधिक रुची ले रहे हैं। मुख्य बात यह है, कि सब्जियों की खेती करने से किसानों की आय में भी काफी इजाफा होगा। इससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार देखने को मिलेगा। हालांकि, पहले पारंपरिक फसलों की खेती करने पर किसानों को खर्चे की तुलना में उतना ज्यादा मुनाफा नहीं होता था। साथ ही, परिश्रम भी काफी ज्यादा करना पड़ता था। बहुत बार तो अत्यधिक बारिश अथवा सूखा पड़ने से फसल भी बर्बाद हो जाती थी। परंतु, वर्तमान में बागवानी करने से किसानों को प्रतिदिन आमदनी हो रही है। 

महाराष्ट्र के नांदेड़ निवासी किसान का चमका नसीब

वर्तमान में हम महाराष्ट्र के नांदेड़ के निवासी एक ऐसे ही किसान के संबंध में बात करेंगे, जिनकी
सब्जी की खेती से किस्मत बदल गई। इस किसान का नाम निरंजन सरकुंडे है। वह नांदेड जिला स्थित जांभाला गांव के मूल निवासी हैं। निरंजन सरकुंडे एक छोटे किसान हैं। उनके समीप काफी कम भूमि है। उन्होंने डेढ़ बीघे भूमि पर बैंगन की खेती की है। विशेष बात यह है, कि विगत तीन वर्षों से वह इस खेत में बैंगन की पैदावार कर रहे हैं, जिससे उन्हें अभी तक चार लाख रुपये की आमदनी हुई है।

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बैंगन विक्रय कर कमा चुके 3 लाख रुपये का मुनाफा

निरंजन सरकुंडे का कहना है, कि उनके समीप 5 एकड़ खेती करने लायक भूमि है। निरंजन सरकुंडे इससे पहले अपने खेत में पारंपरिक फसलों की खेती किया करते थे। परंतु, उससे उनको उतनी ज्यादा कमाई नहीं हो पाती थी। अब ऐसी स्थिति में उन्होंने सब्जी का उत्पादन करने का निर्णय लिया। उन्होंने डेढ़ बीघे भूमि में बैंगन की बिजाई कर डाली, जिससे कि उनकी अच्छी-खासी आमदनी हो रही है। वर्तमान में वह बैंगन बेचकर 3 लाख रुपये का मुनाफा कमा चुके हैं। हालांकि, वह बैंगन के साथ-साथ पांरपरिक फसलों का भी उत्पादन कर रहे हैं। 

निरंजन सरकुंडे के बैगन की बिक्री स्थानीय बाजार में ही हो जाती है

वर्तमान में निरंजन सरकुंडे पूरे गांव के लिए मिसाल बन गए हैं। वर्तमान में पड़ोसी गांव ठाकरवाड़ी के किसानों ने भी उनको देखकर सब्जी की खेती चालू कर दी है। निरंजन सरकुंडे ने बताया है, कि इस डेढ़ बीघे भूमि में बैंगन की खेती से वह तकरीबन 3 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा अर्जित कर चुके हैं। हालांकि, डेढ़ बीघे भूमि में बैंगन की खेती करने पर उनको 30 हजार रुपये का खर्चा करना पड़ता है। छोटी जोत के किसान निरंजन द्वारा पैदा किए गए बैंगन की स्थानीय बाजार में अच्छी-खासी बिक्री है। सरकुंडे ने बताया है, कि ह वह अपने खेत की सब्जियों को बाहर सप्लाई नहीं करते हैं। उनके बैगन की स्थानीय बाजार में ही काफी अच्छी बिक्री हो जाती है।

किसान निरंजन सरकुंडे ने ड्रिप सिंचाई के माध्यम से बैगन की खेती कर कमाए लाखों

किसान निरंजन सरकुंडे ने ड्रिप सिंचाई के माध्यम से बैगन की खेती कर कमाए लाखों

जैसा कि हम सब जानते हैं कि बैंगन एक ऐसी सब्जी है जिसकी हमेशा मांग बनी रहती है। इसका भाव सदैव 40 से 50 रुपये किलो के समीप रहता है। एक बीघे भूमि में बैंगन का उत्पादन करने पर 20 हजार रुपये के आसपास लागत आएगी। दरअसल, लोगों का मानना है कि नकदी फसलों की खेती में उतना ज्यादा मुनाफा नहीं है। विशेष रूप से हरी सब्जियों के ऊपर मौसम की मार सबसे ज्यादा पड़ती है। वह इसलिए कि हरी सब्जियां सामान्य से अधिक बारिश, गर्मी एवं ठंड सहन नहीं कर पाती हैं। इस वजह से ज्यादा लू बहने, पाला पड़ने एवं अत्यधिक बारिश होने पर बागवानी फसलों को सबसे ज्यादा क्षति पहुंचती है। हालाँकि, बेहतर योजना और आधुनिक ढ़ंग से सब्जियां उगाई जाए, तो इससे ज्यादा मुनाफा किसी दूसरी फसल की खेती के अंदर नहीं हैं। यही कारण है, कि अब महाराष्ट्र में किसान पारंपरिक फसलों के स्थान पर सब्जियों की खेती में अधिक परिश्रम कर रहे हैं।

किसान निरंजन को कितने लाख की आय अर्जित हुई है

आज हम आपको एक ऐसे किसान के विषय में जानकारी देंगे, जिन्होंने सफलता की नवीन कहानी रची है। बतादें, कि इस किसान का नाम निरंजन सरकुंडे है और यह महाराष्ट्र के नांदेड जनपद के मूल निवासी हैं। सरकुंडे हदगांव तालुका मौजूद निज गांव जांभाला में पहले पारंपरिक फसलों की खेती किया करते थे। परंतु, वर्तमान में वह बैंगन की खेती कर रहे हैं, जिससे उनको काफी अच्छी आमदनी हो रही है। मुख्य बात यह है, कि निरंजन सरकुंडे ने केवल डेढ़ बीघा भूमि में ही बैंगन लगाया है। इससे उन्हें चार लाख रुपये की आय अर्जित हुई है।

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निरंजन को देख अन्य पड़ोसी गांव के किसान भी खेती करने लगे

निरंजन का कहना है, कि उनके समीप 5 एकड़ जमीन है, जिस पर वह पूर्व में पारंपरिक फसलों की खेती किया करते थे। परंतु, इससे उनके घर का खर्चा नहीं चल रहा था। ऐसे में उन्होंने डेढ़ बीघे खेत में बैंगन की खेती चालू कर दी। इसके पश्चात उनकी तकदीर बदल गई। वह प्रतिदिन बैंगन बेचकर मोटी आमदनी करने लगे। उनको देख प्रेरित होकर उनके पड़ोसी गांव ठाकरवाड़ी के किसानों ने भी सब्जी का उत्पादन कर दिया। वर्तमान मे सभी किसान सब्जी की पैदावार कर बेहतरीन आमदनी कर रहे हैं।

निरंजन सरकुंडे ड्रिप इरिगेशन विधि से फसलों की सिंचाई करते हैं

सरकुंड के गांव में सिंचाई हेतु पानी की काफी किल्लत है। इस वजह से वह ड्रिप इरिगेशन विधि से फसलों की सिंचाई करते हैं। उन्होंने बताया है, कि रोपाई करने के दो माह के उपरांत बैंगन की पैदावार हो जाती है। वह उमरखेड़ एवं भोकर के समीपवर्ती बाजारों में बैंगन को बेचा करते हैं। इस डेढ़ बीघे भूमि में बैंगन की खेती से निरंजन सरकुंडे को तकरीबन 3 लाख रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ है। वहीं, डेढ़ बीघे भूमि में बैंगन की खेती करने पर 30 हजार रुपये की लागत आई थी। उनकी मानें तो फिलहाल वह धीरे- धीरे बैंगन का रकबा बढ़ाएंगे। पारंपरिक खेती की बजाए आधुनिक ढ़ंग से बागवानी फसलों का उत्पादन करना काफी फायदेमंद है।
अनार की खेती ने जेठाराम की तकदीर बदली, बड़े- बड़े बिजनेसमैन को पीछे छोड़ा

अनार की खेती ने जेठाराम की तकदीर बदली, बड़े- बड़े बिजनेसमैन को पीछे छोड़ा

किसान जेठाराम कोडेचा द्वारा उपजाए गए अनार की सप्लाई दिल्ली, अहमदाबाद, कलकत्ता, बेंगलुरु और मुंबई ही नहीं बल्कि बंग्लादेश में भी हो रही है। इससे वे साल में लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं। ज्यादातर लोगों का कहना है, कि खेती- किसानी में अब लाभ नहीं रहा। लागत की तुलना में आमदनी बहुत कम हो गई है। बहुत बार तो उचित भाव नहीं मिलने पर किसानों को हानि हो जाती है। परंतु, परिश्रम और नवीन तकनीक के माध्यम से खेती की जाए, तो यही धरती सोना उगलने लगती है। बस इसके लिए आपको थोड़ा धीरज रखना होगा। आज हम राजस्थान के एक ऐसे किसान के बारे में बात करेंगे, जिन्होंने खेती से बड़े- बड़े व्यवसायियों को लोहा मनवा दिया है। वे खेती से ही लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं।

अनार की खेती ने बदली जेठाराम की किस्मत

बतादें, कि हम बाड़मेर जिला स्थित भीमडा गांव निवासी जेठाराम कोडेचा के विषय में बात कर रहे हैं। पहले वे पांरपरिक फसलों की खेती करते थे, लेकिन इसमें उन्हें उतनी आमदनी नहीं होती थी। इसके उपरांत उन्होंने खेती करने का तरीका बदल दिया एवं बागवानी शुरू कर दी। वह वर्ष 2016 से अनार की खेती कर रहे हैं। इससे उनकी तकदीर चमक गई। उनके खेत में उगाए गए अनार की आपूर्ति महाराष्ट्र, कलकत्ता बांग्लादेश तक में हो रही है। 

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जेठाराम ने 15 लाख रुपये का लोन लेकर स्टार्टअप के रूप में अनार की खेती शुरू की थी

विशेष बात यह है, कि वर्ष 2016 में जेठाराम ने 15 लाख रुपये का लोन लेकर स्टार्टअप के रूप में अनार की खेती शुरू की थी। इसके लिए उन्होंने महाराष्ट्र के नाशिक से अनार की उन्नत किस्म के 4 हजार पौधे मंगवाए थे। इसके उपरांत कोडेचा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

 

जेठाराम कोडेचा को इतनी आमदनी होती है

मुख्य बात यह है, कि जेठाराम कोडेचा पढ़े- लिखे नहीं है। वे अनपढ़ अंगूठा छाप किसान हैं। इसके होते हुए भी उन्होंने बड़े- बड़े बिजनेसमैन को खुद से पीछे छोड़ दिया है। वह अपने खेत में अनार की भगवा एवं सिंदूरी सरीखी उन्नत किस्मों की पैदावार कर रहे हैं। जेठाराम ने 45 बीघा भूमि में अनार की खेती कर रखी है। एक पौधे से 25 किलो अनार की पैदावार होती है। जेठाराम की मानें तो अनार की खेती चालू करने के एक साल के उपरांत से आमदनी होने लगी। अनार बेचकर दूसरे वर्ष उन्होंने 7 लाख रुपये की आमदनी की थी। इसी प्रकार तीसरे वर्ष 15 लाख, चौथे साल 25 लाख, पांचवें साल अनार से उन्हें 35 लाख रुपये की आमदनी हुई। वह कहते हैं, कि अभी तक अनार बेचकर वह 80 लाख रुपये की आमदनी कर चुके हैं।

सेवानिवृत फौजी महज 8 कट्ठे में सब्जी उत्पादन कर प्रति माह लाखों की आय कर रहा है

सेवानिवृत फौजी महज 8 कट्ठे में सब्जी उत्पादन कर प्रति माह लाखों की आय कर रहा है

राजेश कुमार का कहना है, कि उन्होंने वीएनआर सरिता प्रजाति के कद्दू की खेती की है। बुवाई करने के एक माह के उपरांत इसकी पैदावार शुरू हो गई। नौकरी से सेवानिवृत होने के उपरांत अधिकतर लोग विश्राम करना ज्यादा पसंद करते हैं। उनकी यही सोच रहती है, कि पेंशन के सहयोग से आगे की जिन्दगी आनंद और मस्ती में ही जी जाए। परंतु, बिहार में सेना के एक जवान ने रिटायरमेंट के उपरांत कमाल कर डाला है। उसने गांव में आकर हरी सब्जियों की खेती चालू कर दी है। इससे उसको पूर्व की तुलना में अधिक आमदनी हो रही है। वह वर्ष में सब्जी बेचकर लाखों रुपये की आमदनी कर रहे हैं। 

राजेश कुमार पूर्वी चम्पारण की इस जगह के निवासी हैं

सेवानिवृत फौजी पूर्वी चम्पारण जनपद के पिपरा कोठी प्रखंड मोजूद सूर्य पूर्व पंचायत के निवासी हैं। उनका नाम राजेश कुमार है, उन्होंने रिटायरमेंट लेने के पश्चात विश्राम करने की बजाए खेती करना पसंद किया। जब उन्होंने खेती आरंभ की तो गांव के लोगों ने उनका काफी मजाक उड़ाया। परंतु, राजेश ने इसकी परवाह नहीं की और अपने कार्य में लगे रहे। परंतु, जब मुनाफा होने लगा तो समस्त लोगों की बोलती बिल्कुल बंद हो गई। 

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कद्दू की बिक्री करने हेतु बाहर नहीं जाना पड़ता

विशेष बात यह है, कि राजेश कुमार को अपने उत्पाद की बिक्री करने के लिए बाजार में नहीं जाना पड़ता है। व्यापारी खेत से आकर ही सब्जियां खरीद लेते हैं। सीतामढ़ी, शिवहर, गोपालगंज और सीवान से व्यापारी राजेश कुमार से सब्जी खरीदने के लिए उनके गांव आते हैं। 

कद्दू की खेती ने किसान को बनाया मालामाल

किसान राजेश कुमार की मानें तो 8 कट्ठा भूमि में कद्दू की खेती करने पर 10 से 20 हजार रुपये की लागत आती थी। इस प्रकार उनका अंदाजा है, कि लागत काटकर इस माह वह 1.30 लाख रुपये का मुनाफा हांसिल कर लेंगे।

 

किसान राजेश ने 8 कट्ठे खेत में कद्दू का उत्पादन किया है

विशेष बात यह है, कि पूर्व में राजेश कुमार ने प्रयोग के रूप में पपीता की खेती चालू की थी। प्रथम वर्ष ही उन्होंने पपीता विक्रय करके साढ़े 12 लाख रुपये की आमदनी कर डाली। इसके पश्चात सभी लोगों का मुंह बिल्कुल बंद हो गया। मुनाफे से उत्साहित होकर उन्होंने आगामी वर्ष से केला एवं हरी सब्जियों की भी खेती शुरू कर दी। इस बार उन्होंने 8 कट्ठे भूमि में कद्दू की खेती चालू की है। वह 300 कद्दू प्रतिदिन बेच रहे हैं, जिससे उनको 4 से 5 हजार रुपये की आय अर्जित हो रही है। इस प्रकार वह महीने में डेढ़ लाख रुपये के आसपास आमदनी कर रहे हैं।

महिला किसान स्मारिका चंद्राकर ने MNC कंपनी से लाखों की नौकरी छोड़ खेती को चुना

महिला किसान स्मारिका चंद्राकर ने MNC कंपनी से लाखों की नौकरी छोड़ खेती को चुना

आज हम मेरीखेती के इस लेख में आपको एक सफल महिला किसान स्मारिका चंद्राकर के विषय में बताऐंगे। बतादें, कि महिला किसान के कृषि फार्म में 19 एकड़ में बैंगन और टमाटर लगा हुआ है। हालाँकि, इससे पूर्व उसी खेत में अन्य बागवानी फसलें जैसे कि खीरा, करेला और लौकी लगा हुआ था। दरअसल, स्मारिका का बचपन गांव में बीता है, इसके बाद वह पढ़ाई करने के लिए पुणे चली गई हैं। परंतु, वह पुनः गांव में ही आकर बस गई। अब वह आत्मनिर्भर किसान है। कृषि वर्तमान में एक व्यवसाय भी बन गया है। नवीनतम एवं उन्नत तकनीकों के आने से पूर्व की तुलना में फल, सब्जी और अनाजों का उत्पादन भी गढ़ गया है। इससे किसानों की आय काफी बढ़ गई है। यही कारण है, कि अब पढ़े- लिखे युवा भी लाखों रुपये महीने की नौकरी छोड़ कर खेती- किसानी की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। परंतु, आज हम एक ऐसी युवती के विषय में जानकारी देंगे, जो नौकरी छोड़ने के उपरांत खेती से करोड़पति बन गई। वर्तमान में अन्य दूसरे लोग भी युवती से खेती करने की बारीकी सीख रहे हैं।

स्मारिका चंद्राकर मूलतयः कहाँ की रहने वाली है

दरअसल, हम जिस युवती के विषय में चर्चा कर रहे हैं, उसका नाम स्मारिका चंद्राकर है। वह छत्तीसगढ़ के धमतरी जनपद स्थित कुरुद प्रखंड के चरमुड़िया गांव की मूल निवासी हैं। स्मारिका चंद्राकर ने पुणे महाराष्ट्र से एमबीए पास है। साथ ही, उसने कम्प्यूटर साइंस में बीई भी कर रखी है। पहले वह मल्टीनेशनल कंपनी में 15 लाख रुपए के वार्षिक पैकेज पर नौकरी किया करती थी। बतादें, कि सबकुछ अच्छा चल रहा था। इसी दौरान उसके पिताजी की तबीयत खराब हो गई। यही स्मारिका चंद्राकर के लिए टर्निंग प्वांइट साबित हुआ।

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स्मारिका चंद्राकर बागवानी से जबरदस्त उत्पादन प्राप्त कर रही हैं

स्मारिका चंद्राकर का कहना है, कि उसके पिता के पास गांव में काफी ज्यादा भूमि है। उन्होंने वर्ष 2020 में 23 एकड़ भूमि पर सब्जी की खेती चालू की थी। परंतु, स्वास्थ्य खराब होने के चलते वे बेहतर ढ़ंग से खेती नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में स्मारिका चंद्राकर ने नौकरी छोड़ गांव आकर अपने पिता के साथ खेती में सहयोग करना शुरू कर दिया। उसके बाद देखते ही देखते वह वैज्ञानिक ढ़ंग से अपने समस्त भू-भाग पर खेती शुरू कर दी। उसने मृदा की गुणवत्ता के मुताबिक ही फसल का चुनाव भी किया। इससे उन्हें जबरदस्त उत्पादन प्राप्त होने लगा।

स्मारिका चंद्राकर की सब्जियों की सप्लाई कई राज्यों में होती है

बतादें, कि स्मारिका चंद्राकर ने कुछ रुपये खर्च कर अपने खेत को आधुनिक कृषि फार्म बना दिया। इसका लाभ यह हुआ कि अब स्मारिका चंद्राकर के धारा कृषि फार्म से प्रतिदिन 12 टन टमाटर और 8 टन बैंगन की पैदावार हो रही है। स्मारिका का वार्षिक टर्नओवर एक करोड़ रुपये से भी ज्यादा है। मुख्य बात यह है, कि स्मारिका न केवल खेती से आमदनी कर रही है, बल्कि 150 लोगों को रोजगार भी उपलब्ध कर रखा है। स्मारिका के खेत में उगाए गए बैंगन और टमाटर की आपूर्ति उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और दिल्ली में भी होती है।
महिला किसान गेंदे की खेती से कर रही अच्छी-खासी आमदनी

महिला किसान गेंदे की खेती से कर रही अच्छी-खासी आमदनी

आजकल बदलते दौर में किसान अपना रुख परंपरागत खेती से हटकर अधिक मुनाफा देने वाली फसलों की खेती करने लगे हैं। इसी कड़ी में झारखंड राज्य के पलामू जनपद की रहने वाली एक महिला किसान गेंदे के फूल की खेती से अमीर हो गई है। फिलहाल, आसपास की महिलाएं और पुरूष भी उससे गेंदे की खेती करने के गुर सीख रहे हैं।

गेंदे के फूल का इस्तेमाल बहुत सारी जगहों पर किया जाता है

हालाँकि, भारत में सभी प्रकार के फूल उत्पादित किए जाते हैं। परंतु,
गेंदा की खेती सर्वाधिक की जाती है। क्योंकि इसका इस्तेमाल भी सर्वाधिक होता है। बतादें कि इसका उपयोग मंच और घर को सजाने से लेकर पूजा- पाठ में सबसे ज्यादा किया जाता है। सिर्फ इतना ही नहीं नेताओं के स्वागत में सबसे अधिक गेंदे की माला ही गले में ड़ाली जाती है। साथ ही, मंदिर और घर के तोरण द्वार भी गेंदे से ही निर्मित किए जाते हैं। ऐसे में किसान गेंदे की खेती कर बेहतर आय कर सकते हैं। आज हम आपको एक ऐसी ही महिला किसान की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसकी किस्मत गेंदे के फूल की खेती से बिल्कुल बदल गई। न्यूज 18 हिन्दी की रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड के पलामू जनपद की रहने वाली एक महिला गेंदे के फूल की खेती कर के मालामाल हो गई है।

आसपास की महिलाऐं और पुरुष मुन्नी से गेंदे की खेती सीखने आते हैं

अब समीपवर्ती महिलाएं और पुरूष भी उससे गेंदे की खेती करने का तौर तरीका सीखने आ रहे हैं। विशेष बात यह है, कि उसने अपने मायके में गेंदे की खेती करने की तकनीक सीखी थी। शादी होने के बाद जब वह अपने ससुराल आई तो स्वयं ही उसने गेंदे के फूल की खेती करनी चालू कर दी। महिला का नाम मुन्नी देवी है। वह पांडू प्रखंड के तिसीबार गांव की रहने वाली है। हाल में वह लगभग 10 एकड़ की भूमि पर गेंदे की खेती कर रही है। ये भी पढ़े: इस फूल की खेती कर किसान हो सकते हैं करोड़पति, इस रोग से लड़ने में भी सहायक

गेंदे के फूल की एक माला की कितनी कीमत है

मुन्नी देवी का कहना है, कि ससुराल आने के उपरांत उन्होंने वर्ष 2019 में गेंदे की खेती आरंभ की थी। प्रथम वर्ष ही उनको काफी अच्छा फायदा हुआ था। इसके उपरांत वह खेती के रकबे में इजाफा करती गईं, जिससे उनका मुनाफा भी बढ़ता गया। मुख्य बात यह है, कि मुन्नी देवी खेती करने के लिए प्रतिवर्ष कलकत्ता से गेंदे के पौधों को मंगवाती हैं। उसके बाद पौधों को लगाकर उनमें वक्त पर उर्वरक और सिंचाई करती हैं। तीन माह में पौधों में गेंदे के फूल आने शुरू हो जाते हैं। इसके उपरांत वह माला बनाकर बेच देती हैं। केवल एक माला 15 रुपये में बेची जाती है, जिसके अंतर्गत गेंदे के 40 फूल गुथे रहते हैं।

मुन्नी वर्षभर में लाखों रुपये की आमदनी कर रही है

सालाना आमदनी को लेकर मुन्नी देवी ने कहा है, कि वर्ष में वह दो बार गेंदे की खेती करती हैं। जनवरी के माह में लगाए गए पौधों में तीन माह के अंतर्गत फूल आ जाते हैं। क्योंकि, अप्रैल से लेकर जून तक शादियों का सीजन चलता है। ऐसे में गेंदे की बिक्री बड़ी ही सुगमता से हो जाती है। उसके बाद अगस्त और सितंबर माह में गेंदे के पौधों का रोपण किया जाता है। सर्दियों के मौसम में यह फूलों से लद जाते हैं। इसके चलते पौधों में बड़े- बड़े आकार के सुगंधित गेंदे के फूल आते हैं। फिलहाल, मुन्नी देवी गेंदे की खेती से वर्षभर में लाखों रुपये की आमदनी कर रही हैं।
बिहार के किसान विजय कुमार ने वैज्ञानिक तरीके से गर्मी के सीजन में भी उगाई गोभी

बिहार के किसान विजय कुमार ने वैज्ञानिक तरीके से गर्मी के सीजन में भी उगाई गोभी

बिहार के पूर्वी चंपारण के किसान विजय कुमार वैज्ञानिक तौर तरीके से गर्मी के मौसम में भी गोभी का उत्पादन कर रहे हैं। विजय ने 12 कट्ठे भूमि के हिस्से पर गोभी की खेती की है। गोभी की सब्जी प्रत्येक व्यक्ति को काफी पसंद आती है। इसमें विभिन्न विटामिन्स और पोषक तत्व विघमान रहते हैं। इसके अंतर्गत विटामिन-बी6, मैंगनीज, फॉसफोरस, फाइबर, विटामिन-के, फोलेट, पोटैशियम, मैग्नीशियम और विटामिन-सी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इसका सेवन करने से शरीर को प्रचूर मात्रा में पोषक तत्व मिलते हैं। इससे इंसान की सेहत काफी अच्छी रहती है। पहले गोभी के लिए करीब 8 महीने की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। क्योंकि, इसकी उत्पादन केवल ठंडे मौसम में ही हुआ करता था। परंतु, फिलहाल अब ऐसा कुछ नहीं है। गर्मी के सीजन में भी गोभी की खेती की जा रही है। बिहार के एक किसान ने भी एक ऐसा ही कारनामा कर दिखाया है।

किसान विजय कुमार ने 12 कट्ठे जमीन पर गोभी की खेती चालू की है

मीडिया खबरों के अनुसार, पूर्वी चंपारण के किसान विजय कुमार वैज्ञानिक विधि से गर्मी के दिनों में भी गोभी की खेती कर रहे हैं। उन्होंने 12 कट्ठे भूमि पर गोभी की खेती शुरू की है। विशेष बात यह है, कि विजय कुमार एफएलडी के भीतर गोभी का उत्पादन कर रहे हैं। उन्होंने अपनी 12 कट्ठे की पूरी जमीन पर एफएलडी बना रखा है। हालांकि, इसके ऊपर उन्होंने बेहद खर्चा किया है। विजय का यह कहना है, कि 10 दिन के बाद गोभी की फसल पूर्णतय तैयार हो जाएगी। इसके बाद हमारे खेत में उगाई गई गोभी लोग बाजार से खरीद पाऐंगे। ये भी देखें: रंगीन फूलगोभी उगा कर किसान हो रहें हैं मालामाल, जाने कैसे कर सकते हैं इसकी खेती

एफएलडी बनाने में करीब 25 लाख का खर्चा हुआ

किसान विजय कुमार के अनुसार, एफएलडी तैयार करने में कुल 25 लाख रुपये का खर्चा हुआ था। दरअसल, इसके लिए सरकार की तरफ से उनको 90 फीसद अनुदान भी प्राप्त हुआ था। विशेष बात यह है, कि गोभी का उत्पादन चालू करने से पूर्व उन्होंने एफएलडी के भीतर ही गोभी की नर्सरी भी तैयार की थी। गोभी के बीज पर उनको 8 हजार रुपये की लागत लगानी पड़ी। इसके अतिरिक्त सिंचाई एवं लेबर चार्ज पर भी 12 हजार रुपये का व्यय करना पड़ा। परंतु, उनका यह कहना है, कि वह गोभी से बेहतरीन मुनाफा उठाऐंगे।

गोभी बाजार में 50 से 60 रूपये प्रति किलो बेची जा रही है

मुख्य बात यह है, कि विजय ने मार्च माह के आखरी सप्ताह में गोभी के पौधे रोपे थे। जून के पहले सप्ताह से खेत से गोभी निकलना शुरू हो जाऐगा। फिलहाल, शादियों का समय चल रहा है। शादियों के समय मिक्स वेज की सब्जी तैयार करने हेतु गोभी की अधिकॉंश मांग रहती है। अब ऐसी स्थिति में उनके खेत के गोभी को व्यापारी बड़ी ही आसानी से खरीद लेंगे। उनको अब ऐसे में बेहतर आमदनी होने की संभावना है। फिलहाल, बाजार में गोभी 50 से 60 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रही है। यदि 50 रुपये किलो के भाव से भी गोभी बिकेगी तब भी मोटी आमदनी होगी।
हरियाणा के कुलदीप बूरा सब्जियों का उत्पादन करके अच्छा-खासा मुनाफा उठा रहे हैं

हरियाणा के कुलदीप बूरा सब्जियों का उत्पादन करके अच्छा-खासा मुनाफा उठा रहे हैं

आज हम आपको एक ऐसे किसान के बारे में बताने जा रहे हैं। जिसने बिजली फिटिंग और रिपेरिंग का काम छोड़कर खेती की तरफ रुख किया है। किसान कुलदीप बूरा हिसार जनपद में मौजूद घिराए गांव के निवासी हैं। पूर्व में वह बिजली फिटिंग और रिपेरिंग का काम करते थे। लेकिन इससे उनको कोई खास अच्छी आय नहीं हो रही थी। हरियाणा एक कृषि प्रधान राज्य है। लोगों का मानना है, कि हरियाणा के किसान गो-पालन सहित चना, धान, गेहूं और सरसों समेत सिर्फ पारंपरिक फसलों की ही खेती करते हैं। हालाँकि, ऐसा कुछ नहीं है, यहां के किसान भी अन्य राज्यों की भांति फल- सब्जियों का बेहतर उत्पादन कर रहे हैं। यहां के कृषकों द्वारा उगाई गईं सब्जियों की आपूर्ति अन्य राज्यों में भी होती है। यही कारण है, कि यहां के किसान सब्जी की खेती आधुनिक ढंग से कर रहे हैं। यहां के एक किसान हैं कुलदीप बूरा, जो सब्जी की खेती से वर्ष में लाखों रुपये की आमदनी कर रहे हैं। फिलहाल, यह अन्य किसानों के लिए एक प्रेरणा बन गए हैं। अन्य किसान इनसे सब्जी की खेती करने के गुर सीखने आ रहे हैं।

 

कुलदीप बूरा कहाँ के रहने वाले हैं

किसान तक की खबरों के अनुसार, कुलदीप बूरा हिसार जनपद के अंतर्गत आने वाले घिराए गांव के रहने वाले हैं। पहले वह बिजली फिटिंग एवं रिपेरिंग का कार्य करते थे। परंतु, इससे उन्हें बेहतरीन आमदनी नहीं हो रही थी। ऐसी स्थिति में उन्हें खेती करने का विचार आया। दोस्तों द्वारा दी गई सलाह पर पहले उन्होंने एक एकड़ में हरी सब्जी एवं फलों की खेती शुरू की थी। इससे उनको अच्छी आमदनी भी अर्जित हुई थी। इसके उपरांत वह आहिस्ते-आहिस्ते खेती का क्षेत्रफल बढ़ाते गए। फिलहाल, कुलदीप बूरा ने 16 एकड़ भूमि पर तरबूज, ककड़ी और खीरा समेत विभिन्न प्रकार की सब्जियों की खेती कर रखी है। जिससे उनको वर्षभर में 25 से 30 लाख की आमदनी हो रही है।

 

कुलदीप बूरा ने सब्जी की खेती कब से कर रहे हैं

कुलदीप बूरा का कहना है, कि वह सन 2102 से सब्जी की खेती कर रहे हैं। कुलदीप बूरा ने कई सारे लोगों को नियमित तौर पर रोजगार भी प्रदान कर रखा है। उनके खेत में लगभग 22 महिलाएं कार्य करती हैं। ऐसी स्थिति में हम कह सकते हैं, कि कुलदीप बूरा के अथक परिश्रम की बदौलत केवल उनके घर का ही चूल्हा नहीं जल रहा है, बल्कि 22 अन्य लोगों का जीवन यापन भी चल रहा है। साथ ही, कुलदीप की बेटी मंजू सारी खेती का हिसाब करती है। लेन- देन का पूरा ब्यौरा मंजू ही संभालती है। वहीं, उनका बेटा मुनीश पढ़ाई करता है, बचे हुए समय में खेत पर आकर पिता की सहायता भी करता है। 

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कुलदीप बूरा ने नेट हाउस में खेती करनी कब शुरू की

विशेष बात यह है, कि कुलदीप बूरा वैज्ञानिक विधि से खेती किया करते हैं। साल 2014 में ही उन्होंने नेट हाउस में खेती करना शुरू कर दिया था। इसके लिए उन्हें हरियाणा सरकार की तरफ से अनुदान मिला था। उनका यह भी कहना है, कि नेट हाउस में खेती करने पर अच्छा उत्पादन मिलता है। हालांकि, कई बार कुलदीप बूरा को मौसम की मार भी झेलनी पड़ती है। इससे उनको आर्थिक हानि का भी सामना पड़ता है।

पॉली हाउस तकनीक से खीरे की खेती कर किसान कमा रहा बेहतरीन मुनाफा

पॉली हाउस तकनीक से खीरे की खेती कर किसान कमा रहा बेहतरीन मुनाफा

पॉली हाउस में खीरे का उत्पादन करने पर बारिश, आंधी, लू, धूप और सर्दी का प्रभाव नहीं होता है। आप किसी भी मौसम में पॉली हाउस के भीतर किसी भी फसल का उत्पादन कर सकते हैं। खीरा खाना प्रत्येक व्यक्ति को अच्छा लगता है। साथ ही, खीरा में आयरन, फास्फोरस, विटामिन ए, विटामिन बी1, विटामिन बी6, विटामिन सी,विटामिन डी और पौटेशियम भरपूर मात्रा में विघमान रहता है। नियमित तौर पर खीरे का सेवन करने पर शरीर चुस्त-दुरुस्त रहता है। साथ ही, खीरे में बहुत ज्यादा फाइबर भी पाया जाता है। खीरे से कब्ज की परेशानी से छुटकारा मिलता है। यही कारण है, कि बाजार में खीरे की मांग वर्षों बनी रहती है। अब ऐसी स्थिति में मांग को पूर्ण करने के लिए किसान पॉली हाउस के भीतर खीरे का उत्पादन कर रहे हैं। इससे किसानों को अच्छी-खासी आमदनी हो रही है।

पॉली हाउस फसल को विभिन्न आपदाओं से बचाता है

वास्तव में पॉली हाउस में खीरे की खेती करने पर ताप, धूप, बारिश, आंधी, लू और ठंड का प्रभाव नहीं पड़ता है। आप किसी भी मौसम में पॉली हाउस के भीतर किसी भी फसल की खेती आसानी से कर सकते हैं। इससे उनका उत्पादन भी बढ़ जाता है और किसान भाइयों को मोटा मुनाफा प्राप्त होता है। इसी कड़ी में एक किसान हैं दशरथ सिंह, जिन्होंने पॉली हाउस तकनीक के जरिए खेती शुरू कर लोगों के सामने नजीर पेश की है। दशरथ सिंह अलवर जनपद के इंदरगढ़ के निवासी हैं। वह लंबे वक्त से पॉली हाउस के भीतर खीरे का उत्पादन कर रहे हैं। इससे उनको काफी अच्छी आमदनी भी अर्जित हो रही है। ये भी देखें: नुनहेम्स कंपनी की इम्प्रूव्ड नूरी है मोटल ग्रीन खीरे की किस्म

किसान खीरे की कितनी उपज हांसिल करता है

दशरथ सिंह पूर्व में पारंपरिक विधि से खेती किया करते थे। उनको पॉली हाउस के संदर्भ में कोई जानकारी नहीं थी। एक दिन उनको उद्यान विभाग के संपर्क में आकर उनको पॉली हाउस तकनीक से खेती करने की जानकारी प्राप्त हुई है। इसके पश्चात उन्होंने 4000 वर्ग मीटर के क्षेत्रफल में पॉली हाउस का निर्माण करवाया और उसके अंदर खीरे का उत्पादन चालू कर दिया।

बहुत सारे किसान पॉली हाउस तकनीक से खेती करते हैं

किसान दशरथ सिंह का कहना है, कि पॉली हाउस की स्थापना करने पर उनको 15 लाख रुपये का खर्चा करना पड़ा। हालांकि, सरकार की ओर से उनको 23 लाख 50 हजार का अनुदान भी मिला था। उनको देख कर फिलहाल जनपद में बहुत सारे किसान भाइयों ने पॉली हाउस के भीतर खेती शुरू कर दी है।

लखन यादव ने पॉली हाउस तकनीक को लेकर क्या कहा

साथ ही, दशरथ सिंह के बेटे लखन यादव का कहना है, कि हम पॉली हाउस के भीतर केवल खीरे की ही खेती किया करते हैं। विशेष बात यह है, कि वह पॉली हाउस के भीतर सुपर ग्लो-बीज का उपयोग करते हैं, इससे फसल की उन्नति एवं प्रगति भी शीघ्र होती है। उनका यह भी कहना है, कि उन्हें एक बार की फसल में 60 से 70 टन खीरे की उपज अर्जित हुई थी। वहीं, एक फसल तैयार होने में करीब 4 से 5 माह का समय लगता है। बतादें, कि 60 से 70 टन खीरों का विक्रय कर वे 12 लाख रुपये की आय कर लेते हैं। इसमें से 6 लाख तक का मुनाफा होता है।
इस राज्य के गुलाब उत्पादक किसान ने गुलाब की खेती कर मिशाल पेश की है

इस राज्य के गुलाब उत्पादक किसान ने गुलाब की खेती कर मिशाल पेश की है

आज हम आपको इस लेख में एक सफल फूल उत्पादक किसान के बारे में बताने जा रहे हैं। जो कि प्रतिमाह 80 किलो तक गुलाब के फूल की पैदावार कर रहे हैं। विशेष बात यह है, कि वह गुलाब के फूल की स्वयं ही बाजार में आपूर्ति करते हैं। सामान्य तौर पर जब हम हरियाणा का नाम सुनते हैं, तो सबसे पहले हमारे मन में धान और गेंहू की खेती का नाम सामने आता है। लोगों का ऐसा मनना है, कि हरियाणा में किसान केवल धान और गेंहू की ही खेती किया करते हैं। परंतु, इस तरह की कोई बात नहीं है। देश के अन्य राज्यों की ही भांति हरियाणा में भी किसान बागवानी फसलों का उत्पादन किया करते हैं। इससे किसान भाइयों की अच्छी-खासी कमाई हो जाती है। विशेष बात यह है, कि बागवानी फसलों पर राज्य सरकार के स्तर से किसान भाइयों को अनुदान दिया जाता है। हरियाणा के फूल उत्पादक किसान राजेश कुमार ने गुलाब की खेती करके अन्य लोगों के लिए नजीर पेश की है।

राजेश ने 6 कनाल में गुलाब की खेती कर रखी है

किसान तक के मुताबिक, इस किसान का नाम राजेश कुमार है। जो कि हिसार जनपद के हिदवान गांव के निवासी हैं। दरअसल, पहले राजेश सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी किया करते थे। परंतु, इसके बावजूद भी उनके घर में आर्थिक समस्या बनी रहती थी। ऐसी स्थिति में उनको एक माली ने गुलाब की खेती करने की राय दी। इसके उपरांत राजेश ने सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी छोड़ दी। वह हिदवान गांव में आकर अपनी पुश्तैनी जमीन पर जैविक विधि से गुलाब की खेती करने लगे। वर्तमान में राजेश ने 6 कनाल में गुलाब की खेती कर रखी है। इससे वह प्रतिमाह 80 किलो तक गुलाब के फूल उत्पादित कर रहे हैं। विशेष बात यह है, कि वह गुलाब के फूल को स्वयं ही बाजार में सप्लाई करते हैं।

राजेश कुमार प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये की आमदनी कर रहे हैं

साथ ही, अपने खेत में उत्पादित किए गए गुलाब के फूल द्वारा गुलकंद, शरबत और गुलाब जल भी तैयार करते हैं। इन उत्पादों को वह और उनकी पत्नी मिलकर स्वयं ही घर-घर जाकर बेचते हैं। राजेश ने बताया है, कि गुलाब की खेती से वह प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये की आमदनी कर रहे हैं। विशेष बात यह है, कि अब वह अन्य किसानों को भी जैविक विधि से गुलाब के फूलों की खेती करने का प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं। उनको देखकर फिलहाल 40 किसानों ने गुलाब की खेती चालू कर दी है। इससे समस्त किसान भाइयों को काफी ज्यादा लाभ हो रहा है। ये भी देखें: गमले में कैसे उगाएं गुलाब के खूबसूरत फूल

किसान राजेश खाद के तौर पर सदैव गोबर का ही उपयोग करते हैं

किसान राजेश कुमार ने बताया है, कि उनके खेत में उत्पादित किए गए गुलाब के फूल एवं उससे निर्मित किए गए उत्पादों की मांग बाजार में आहिस्ते-आहिस्ते बढ़ती जा रही है। उनका कहना है, कि अपने खेत में वह खाद के तौर पर सदैव गोबर का ही उपयोग किया करते हैं। वह अपने उत्पाद को भिवानी, बहादुरगढ़, पंचकूला, सिरसा, हिसार, फतेहाबाद, चंडीगढ़, मोहाली, अंबाला और रोहतक में जाकर स्वयं ही सप्लाई करते हैं। राजेश कुमार के मुताबिक, किसान राजेश और उनकी पत्नी दोनों एकसाथ मिलकर प्रतिदिन सुबह गुलाब के फूलों को तोड़ने के बाद बेचने के लिए बाजार लेकर जाते हैं।
गाय के गोबर से बेहतरीन आय करने वाले 'जैविक मैन' नाम से मशहूर किसान की कहानी

गाय के गोबर से बेहतरीन आय करने वाले 'जैविक मैन' नाम से मशहूर किसान की कहानी

आज हम आपको जैविक खेती करने वाले एक किसान मुनिलाल महतो का कहना है, कि फिलहाल रासायनिक खाद 40 रुपये किलो तक की कीमत पर बिक रहा है। जैविक उर्वरक का भाव मात्र 6 रुपये प्रतिकिलो ही हैं। कीटनाशकों एवं रासायनिक खादों के इस्तेमाल से मृदा की उर्वरक शक्ति बेहद कमजोर पड़ती जा रही है। इससे खेत बंजर पड़ते जा रहे हैं। ऐसे में एक बार पुनः जैविक उर्वरकों की मांग में वृद्धि हुई है। लोग जैविक खाद के लिए काफी मोटी धनराशि खर्च कर रहे हैं। परंतु, इसके उपरांत भी किसानों को वक्त पर ऑर्गेनिक खाद प्राप्त नहीं हो पा रहा है। अब ऐसी स्थिति में बेगूसराय के मुनिलाल महतो जैविक विधि से खेती करने वाले कृषकों के लिए रोबिनहुड से कम नहीं हैं। वह किसानों को समुचित कीमत पर जैविक विधि से खेती करने वाले कृषकों को ऑर्गेनिक खाद मुहैय्या करा रहे हैं। विशेष बात यह है, कि जैविक खाद हेतु एडवांस में उनके पास आदेश पहुंच जाते हैं।

मुनिलाल महतो अपने इलाके में जैविक मैन के नाम से मशहूर हैं

हिंदी खबरों के मुताबिक, मुनिलाल महतो संपूर्ण इलाके में ‘जैविक मैन’ के नाम से मशहूर हैं। ध्यान देने वाली बात यह है, कि मुनिलाल किसानों को जैविक विधि से खेती करने का प्रशिक्षण भी देते हैं। अब तक वह क्षेत्र के सैकड़ों किसान भाइयों को प्रशिक्षण दे चुके हैं। ऐसे मुनिलाल महतो स्वयं भी जैविक विधि से खेती करते हैं। बतादें, कि साल 2013 से वह पूर्णतया ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं। इससे उनकी आमदनी बढ़ चुकी है।

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जैविक विधि से उत्पादों का बेहतरीन भाव मिल जाता है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि जनपद के चेरिया बरियारपुर प्रखंड के गोपालपुर पंचायत के किसान प्रमोद महतो का कहना है, कि मैंने भी उनसे ही प्रेरणा लेकर जैविक खेती करना चालू किया है। इससे मेरी भी आमदनी में इजाफा हुआ था। प्रमोद महतो ने बताया है, कि आज वे वर्मी कंपोस्ट तैयार करने के साथ- साथ फ्लाईश खाद का भी उत्पादन कर रहे हैं। प्रमोद महतो के मुताबिक बाजार में जैविक विधि से पैदा किए गए उत्पाद का काफी अच्छा भाव मिल जाता है। इससे किसान वर्तमान में धीरे- धीरे जैविक खेती की ओर अपना रुख कर रहे हैं।

रासायनिक खाद कितने रुपए प्रति किलो बिक रही है

मुनिलाल महतो के अनुसार, बाजार में फिलहाल रासायनिक खाद 40 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रही है। लेकिन, जैविक उर्वरक का भाव केवल 6 रुपये प्रति किलो ही है। उन्होंने बताया है, कि रासायनिक खाद के इस्तेमाल से फसलों को 6 बार सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। साथ ही, जैविक विधि से उत्पादित की गई फसलों को मात्र 3 बार ही सिंचाई की आवश्यकता पड़ता है।

जैविक खाद से वर्षभर में कितनी आमदनी की जा सकती है

फिलहाल, मुनिलाल के पास दो गायें हैं। इनके गोबर से वह जैविक खाद बनाते हैं। अपनी 2 एकड़ की जमीन पर वह जैविक खाद का ही इस्तेमाल करते हैं। साथ ही, शेष बचे हुए जैविक खाद की वह बिक्री कर देते हैं, जिससे उनको वर्ष में 60 हजार रुपये की आमदनी होती है। मुख्य बात यह है, कि मुनिलाल कीटनाशक के तौर पर गोमूत्र का इस्तेमाल करते हैं। इससे फसलों को भी किसी प्रकार की हानि नहीं होती है।
बेगूसराय के किसान नीरज ने 2 एकड़ में पपीते की खेती से कमाया लाखों का मुनाफा

बेगूसराय के किसान नीरज ने 2 एकड़ में पपीते की खेती से कमाया लाखों का मुनाफा

नीरज सिंह ने अपने बाग में रेड लेडी किस्म के पपीते की खेती शुरू की है। उनका कहना है, कि वह एक पौधे से 100 किलो तक पपीता तोड़ रहे हैं। उनके बाग में 10 महिलाएं रोज काम करती हैं। पपीता एक ऐसा फल होता है, जिसकी बाजार सालभर उपलब्धता बनी रहती है। पपीता की कीमत 40 से 50 रूपए के मध्य होती है। उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, हरियाणा, पंजाब और बिहार समेत बहुत सारे राज्यों में किसान पपीता का उत्पादन करते हैं। पपीता बागवानी के अंतर्गत आने वाली एक फसल है। बहुत सारे राज्यों में पपीता की खेती को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार द्वारा अच्छा खासा अनुदान प्रदान किया जाता है। विशेष रूप से बिहार के किसान खेती किसानी में अधिक रूची ले रहे हैं। बतादें, कि बिहार के सीतामढ़ी, नलंदा, हाजीपुर, दरभंगा और मधुबनी समेत बहुत सारे जनपदों में किसान पपीते का उत्पादन कर रहे हैं। परंतु, बेगूसराय जनपद की बात ही कुछ हटकर है। यहां पर एक किसान ने पपीते की खेती कर के लोगों के सामने नजीर प्रस्तुत की है।

एक पपीते के पौधे से कितना मुनाफा होता है

चेरिया बरियारपुर प्रखंड स्थित बढ़कुरवा के निवासी हैं। जानकारी के लिए बतादें कि किसान नीरज पपीते की खेती के जरिए सालाना 6 लाख रूपए की आमदनी कर रहे हैं। विशेष बात यह है, कि किसान नीरज सिंह को एक न्यूज चैनल पर प्रसारित एक खास कार्यक्रम से पपीते की खेती करने के लिए प्रेरित हुए। उसके पश्चात उन्होंने पपीते की खेती चालू कर दी। फिलहाल, उन्होंने 2 एकड़ भूमि के रकबे पर पपीते की खेती कर रखी है। विशेष बात यह है, कि पपीते के खेती के लिए नीरज को उद्यान विभाग से भी बेहद सहायता मिली और इसकी खेती आरंभ करने हेतु पौधें भी मुहैय्या कराए गए। वह एक पपीते के पौधे से 50 किलोग्राम तक पपीता की पैदावार कर रहे हैं। ये भी देखें: किसान कर लें ये काम, वरना पपीते की खेती हो जाएगी बर्बाद

पपीते की खेती से एक एकड़ में कितना मुनाफा होगा

मुख्य बात यह है, कि नीरज सिंह ने अपने बाग में रेड लेडी किस्म के पपीते को लगाया है। नीरज ने बताया है, कि वह कुछ पोधों से 100 किलो तक पपीता तोड़ रहे हैं। उनके बाग के अंदर 10 महिलाएं प्रतिदिन कार्य करती हैं। अब ऐसी स्थिति में उन्होंने 10 लोगों को रोजगार भी दे रखा है। किसान नीरज सिंह का कहना है, कि वह रेड लेडी किस्म के पपीते की दो एकड़ भूमि में खेती कर रहे हैं। एक वर्ष में पपीते की फसल तैयार हो जाती है। वह प्रति वर्ष 10 लाख रुपये के पपीते बेचते हैं। बतादें, कि 4 लाख रुपये की लागत को हटाकर वह 6 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा उठाते हैं।

पपीते की खेती के लिए 45 हजार तक अनुदान

उन्होंने बताया है, कि किसानों को परंपरागत खेती के साथ-साथ बागवानी भी करनी चाहिए। विशेष कर पपीते की खेती अवश्य करनी चाहिए। क्योंकि, इसमें दोगुना से भी ज्यादा मुनाफा होता है। यदि आप एक एकड़ में पपीते की खेती करते हैं, तो 2 लाख रुपये की लागत आ जाएगी। साथ ही, सरकार की ओर से प्रति एकड़ 45 हजार रुपये का अनुदान दिया जाता है। इस प्रकार बेगूसराय जनपद के अन्य किसानों के लिए भी पपीते की खेती करने का अच्छा अवसर है।